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पटना हाई कोर्ट सख्त: बिना वैध आदेश घर गिराने पर 3 पीड़ितों को ₹5.50 लाख अंतरिम मुआवजा, पूर्वी चंपारण का मामला

जागरण प्रभात। बिहार के पूर्वी चंपारण में बिना वैध ध्वस्तीकरण आदेश के मकान और चहारदीवारी तोड़े जाने के मामले में पटना हाई कोर्ट ने राज्य प्रशासन के रवैये पर गंभीर सवाल उठाए हैं। न्यायमूर्ति राज कुमार की पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति के घर को कानून की निर्धारित प्रक्रिया के बिना ढहा देना महज संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का मामला नहीं है, बल्कि इससे उसके जीवन, सम्मान, पहचान और मानसिक शांति पर भी गंभीर असर पड़ता है।

कोर्ट ने मामले में तीन याचिकाकर्ताओं को कुल 5.50 लाख रुपये की अंतरिम क्षतिपूर्ति देने का निर्देश दिया है। इसके अलावा मकान और दूसरी संपत्ति को हुए वास्तविक नुकसान का विस्तृत आकलन कर अंतिम मुआवजा तय करने का भी आदेश दिया गया है।

2017 में JCB से गिराया गया था मकान

मामला पूर्वी चंपारण जिले के पताही प्रखंड से जुड़ा है। याचिकाकर्ता विष्णु शंकर सिंह, विनोद कुमार सिंह और अरविंद कुमार सिंह ने हाई कोर्ट में आरोप लगाया था कि उनकी जमीन को लेकर विवाद के बीच उनके मकान और पक्की चहारदीवारी को JCB मशीन से ध्वस्त कर दिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक घटना 11 अप्रैल 2017 की है। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि जमीन से संबंधित अभिलेख उनके पक्ष में थे और अतिक्रमण से जुड़ी कार्यवाही भी लंबित थी। इसके बावजूद बिना किसी वैध ध्वस्तीकरण आदेश के निर्माण को गिरा दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि मौके पर प्रशासन और पुलिस के अधिकारी मौजूद थे, लेकिन कार्रवाई को रोकने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाया गया।

हाई कोर्ट ने प्रशासन की भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात को गंभीरता से लिया कि यदि किसी नागरिक की संपत्ति को कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना गिराया जाता है तो प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से केवल यह कहकर अलग नहीं हो सकता कि कार्रवाई निजी व्यक्तियों या अन्य लोगों ने की थी। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और सम्मान के साथ रहने के अधिकार तथा अनुच्छेद 300-A के तहत संपत्ति से कानून के अधिकार के बिना वंचित न किए जाने के संवैधानिक संरक्षण का उल्लेख किया। पटना हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य अथवा प्रशासनिक अधिकारी कानून अपने हाथ में नहीं ले सकते और न ही ऐसी कार्रवाई को होने दे सकते हैं जिसमें किसी नागरिक के घर को विधिसम्मत प्रक्रिया के बिना नुकसान पहुंचाया जाए।

कोर्ट की अहम टिप्पणी-घर सिर्फ चार दीवारें नहीं

मामले की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणियों में कोर्ट ने घर के महत्व को रेखांकित किया। पीठ ने कहा कि व्यक्ति का जीवन उसके घर से गहराई से जुड़ा होता है। घर का अवैध तरीके से ध्वस्त किया जाना परिवार की पहचान, सुरक्षा और मानसिक शांति को प्रभावित करता है। कोर्ट के आदेश में घर को केवल ईंट-पत्थर या संपत्ति के रूप में देखने के बजाय उससे जुड़े मानवीय और संवैधानिक पहलुओं पर जोर दिया गया है। अदालत ने यह भी कहा कि पैसे से मकान दोबारा बनाया जा सकता है, लेकिन परिवार को अचानक घर से वंचित किए जाने से हुई परेशानी और मानसिक पीड़ा की पूरी भरपाई केवल धन से नहीं हो सकती।

तीन याचिकाकर्ताओं को कितना मुआवजा मिलेगा?

पटना हाई कोर्ट ने पूर्वी चंपारण के आयुक्त को अंतरिम राहत के तौर पर रकम जारी करने का निर्देश दिया है।

  • विष्णु शंकर सिंह — ₹1.50 लाख
  • विनोद कुमार सिंह — ₹2 लाख
  • अरविंद कुमार सिंह — ₹2 लाख

इस तरह तीनों याचिकाकर्ताओं को कुल ₹5.50 लाख का अंतरिम मुआवजा दिया जाएगा। आदेश के अनुसार यह राशि दो महीने के भीतर उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है।

तीन महीने में होगा वास्तविक नुकसान का आकलन

हाई कोर्ट ने केवल अंतरिम मुआवजे तक मामला सीमित नहीं रखा है। कोर्ट ने पूर्वी चंपारण के आयुक्त को निर्देश दिया है कि मकान, चहारदीवारी और अन्य संपत्ति को हुए वास्तविक नुकसान के साथ-साथ याचिकाकर्ताओं को हुई क्षति का विस्तृत आकलन किया जाए। यह प्रक्रिया तीन महीने के अंदर पूरी कर अंतिम क्षतिपूर्ति तय करने का निर्देश दिया गया है।

मुआवजा तय करने की प्रक्रिया से DM को क्यों हटाया गया?

इस मामले में हाई कोर्ट ने पूर्वी चंपारण के जिलाधिकारी को अंतिम मुआवजा तय करने की प्रक्रिया से अलग रखने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने इसके पीछे निष्पक्षता के सिद्धांत का उल्लेख किया। कानूनी सिद्धांत “nemo judex in causa sua” का अर्थ है कि कोई व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता। चूंकि मामले में जिलाधिकारी की भूमिका को लेकर सवाल उठाए गए थे, इसलिए मुआवजा निर्धारण की प्रक्रिया किसी अन्य सक्षम अधिकारी के माध्यम से कराने का निर्देश दिया गया।

मामला आखिर शुरू कैसे हुआ था?

यह मामला जमीन के स्वामित्व और अतिक्रमण से जुड़े विवाद से शुरू हुआ था। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार याचिकाकर्ताओं ने 2015 में खाता संख्या 230 और प्लॉट संख्या 3361 से संबंधित जमीन रजिस्टर्ड बिक्री विलेख के माध्यम से खरीदी थी और उस पर अपने कब्जे का दावा किया था। बाद में जमीन को लेकर स्थानीय स्तर पर विवाद सामने आया। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अतिक्रमण से जुड़ी वैधानिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही उनके मकान और चहारदीवारी को JCB से गिरा दिया गया।

पटना हाई कोर्ट के रिकॉर्ड में भी CWJC No. 6449/2017 — Vishnu Shankar Singh and Others vs The State of Bihar and Others को Land Encroachment मामले के रूप में दर्ज किया गया है।

FIR नहीं होने पर भी कोर्ट ने जताई चिंता

याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि मकान तोड़े जाने के बाद जिम्मेदार लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने की दिशा में प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रशासन के रवैये और उसके बाद की कार्रवाई को गंभीरता से देखा। रिपोर्ट के अनुसार, नुकसान की भरपाई अथवा जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई के बजाय याचिकाकर्ताओं की जमाबंदी से संबंधित कार्रवाई भी आगे बढ़ाई गई थी।

क्यों महत्वपूर्ण है पटना हाई कोर्ट का यह आदेश?

इस आदेश में तीन पहलू खास तौर पर सामने आते हैं-कानूनी प्रक्रिया के बिना संपत्ति से वंचित करना, घर को जीवन और सम्मान से जोड़कर देखना और प्रशासनिक जिम्मेदारी तय करना।

कोर्ट ने अंतरिम मुआवजे के साथ वास्तविक नुकसान का स्वतंत्र आकलन कराने का रास्ता अपनाया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अदालत ने केवल टूटे हुए मकान की कीमत के बजाय नागरिक को हुई व्यापक क्षति को भी ध्यान में रखा है।

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