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बिहार के न्याय मित्रों में बायोमेट्रिक अटेंडेंस पर दो फाड़, 7 हजार में काम नहीं, 45 हजार मानदेय की रखी शर्त

जागरण प्रभात। बिहार की ग्राम कचहरियों में कार्यरत न्याय मित्रों के बीच अब बायोमेट्रिक अटेंडेंस को लेकर नई बहस छिड़ गई है। ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज कराने के मुद्दे पर न्याय मित्रों के बीच ही दो अलग-अलग राय सामने आने लगी हैं। कोई बायोमेट्रिक अटेंडेंस को व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने का जरिया बता रहा है, तो कोई इसे बिना मानदेय बढ़ाए काम का बोझ बढ़ाने की कोशिश मान रहा है। इस विवाद के बीच विरोध करने वाले न्याय मित्रों ने सरकार के सामने बड़ी मांग रख दी है। उनका कहना है कि अगर सरकार महीने के सभी दिन बायोमेट्रिक अटेंडेंस चाहती है और न्याय मित्रों से नियमित रूप से ग्राम कचहरी में काम कराना चाहती है, तो कम से कम 40 से 45 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय देना होगा। आखिर 7 हजार रुपये में घर-परिवार कैसे चलेगा?

बायोमेट्रिक अटेंडेंस पर न्याय मित्रों में क्यों बढ़ा विवाद?

बिहार में न्याय मित्रों की ऑनलाइन उपस्थिति को लेकर अब उनके बीच ही बहस तेज हो गई है। एक पक्ष का कहना है कि बायोमेट्रिक अटेंडेंस लागू होना अच्छी बात है। इससे न्याय मित्रों की उपस्थिति का रिकॉर्ड रहेगा और ग्राम कचहरी के कामकाज में नियमितता आएगी। सरकार की ओर से बनाई गई व्यवस्था का पालन करने में किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए।

वहीं, दूसरे पक्ष का कहना है कि सरकार न्याय मित्रों से हर तरह के काम और जिम्मेदारियां ले रही है, लेकिन उनके मानदेय में वर्षों से कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। ऐसे में केवल बायोमेट्रिक अटेंडेंस और उपस्थिति का दबाव बढ़ाने से न्याय मित्रों की समस्याएं हल नहीं होंगी। उनका कहना है कि पहले मानदेय और सुविधाओं पर सरकार को गंभीरता दिखानी चाहिए।

7 हजार रुपये मानदेय में बच्चों की पढ़ाई और परिवार का खर्च कैसे चले?

बायोमेट्रिक अटेंडेंस को मानदेय वृद्धि से जोड़ने वाले न्याय मित्रों का दर्द आर्थिक स्थिति को लेकर है। उनका कहना है कि वर्तमान में उन्हें महज 7,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय मिलता है। इतनी कम राशि में परिवार का खर्च चलाना, बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया है। न्याय मित्रों का सवाल है कि 7 हजार रुपये में घर चलाएं, बच्चों की पढ़ाई कराएं या ग्राम कचहरी आने-जाने का खर्च उठाएं? कई न्याय मित्रों को अपने पदस्थापित पंचायत तक पहुंचने के लिए 50 से 100 किलोमीटर तक की दूरी तय करनी पड़ती है। ऐसे में आने-जाने में ही अच्छी-खासी राशि खर्च हो जाती है।उनका कहना है कि प्रतिदिन काम करने वाले मजदूर को भी उसकी मेहनत के अनुसार दैनिक मजदूरी मिलती है, लेकिन न्याय मित्रों को इतनी कम राशि में काम करना पड़ रहा है। सरकार को उनकी जिम्मेदारियों और आर्थिक स्थिति को समझना चाहिए।

सप्ताह में दो दिन नहीं, हर कार्यदिवस ग्राम कचहरी में बैठने को तैयार

मानदेय बढ़ाने की मांग कर रहे न्याय मित्रों ने सरकार के सामने एक अलग प्रस्ताव भी रखा है। उनका कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में सप्ताह में सोमवार और शुक्रवार को ग्राम कचहरी में बैठने के बजाय वे सभी कार्यदिवसों में बैठने को तैयार हैं। न्याय मित्रों का कहना है कि वे सुबह से शाम तक निर्धारित समय के अनुसार ग्राम कचहरी में काम करेंगे। महीने के सभी दिनों की बायोमेट्रिक अटेंडेंस दर्ज कराने और अपनी जिम्मेदारियों का बेहतर तरीके से निर्वहन करने में भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन इसके बदले सरकार को भी उनकी आर्थिक स्थिति सुधारनी होगी। उनकी मांग है कि सभी कार्यदिवसों में नियमित उपस्थिति और काम की जिम्मेदारी के अनुरूप कम से कम 40 से 45 हजार रुपये मासिक मानदेय निर्धारित किया जाए।

50 से 100 किलोमीटर दूर पंचायत जाने वाले न्याय मित्रों की अलग परेशानी

न्याय मित्रों के बीच बायोमेट्रिक अटेंडेंस को लेकर मतभेद की एक वजह पंचायतों की दूरी भी बताई जा रही है। विरोध करने वाले न्याय मित्रों का कहना है कि कुछ न्याय मित्र अपने ही पंचायत में काम कर रहे हैं, जबकि कई को अपने घर से काफी दूर दूसरे पंचायतों में जाना पड़ता है। दूर-दराज के पंचायतों में पदस्थापित न्याय मित्रों का कहना है कि उन्हें रोजाना आने-जाने में समय और पैसा दोनों खर्च करना पड़ता है। दूसरी ओर, अपने ही पंचायत में काम करने वाले न्याय मित्रों को यात्रा संबंधी परेशानी अपेक्षाकृत कम होती है। उनका आरोप है कि कुछ लोग केवल अपने सुविधाजनक हालात को देखकर बायोमेट्रिक अटेंडेंस का समर्थन कर रहे हैं, जबकि दूर से आने वाले न्याय मित्रों की मजबूरी को समझने की कोशिश नहीं की जा रही है। हालांकि, बायोमेट्रिक अटेंडेंस का समर्थन करने वाले न्याय मित्रों का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। उनका मानना है कि ऑनलाइन उपस्थिति से व्यवस्था बेहतर होगी। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि सरकार सभी न्याय मित्रों की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर एक समान और व्यावहारिक व्यवस्था बनाए।

2007 से सेवा, 2015 के बाद भी 7 हजार रुपये पर अटके न्याय मित्र

न्याय मित्रों का कहना है कि बिहार में वर्ष 2007 से उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हुई थी। तब से वे ग्राम कचहरी की व्यवस्था में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसके बावजूद मानदेय के मामले में उनकी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। उनका कहना है कि वर्ष 2015 में मानदेय बढ़ाकर 7,000 रुपये किया गया था, लेकिन इसके बाद अब तक इसमें बढ़ोतरी नहीं हुई। दूसरी ओर, लोकसभा, विधानसभा और पंचायत चुनाव सहित सरकार की ओर से सौंपे जाने वाले विभिन्न कार्यों में भी उनकी सेवाएं ली जाती हैं। न्याय मित्रों का सवाल है कि जब सरकार उनसे अतिरिक्त जिम्मेदारियां निभाने की अपेक्षा करती है, तो उनके मानदेय में सम्मानजनक बढ़ोतरी क्यों नहीं की जा रही है?

सरकार से अपील- बायोमेट्रिक अटेंडेंस भी बनाएंगे, मानदेय भी बढ़ाइए

बायोमेट्रिक अटेंडेंस का विरोध कर रहे न्याय मित्रों का कहना है कि वे सरकार से टकराव नहीं चाहते। वे ग्राम कचहरी का काम पहले से बेहतर तरीके से करना चाहते हैं। ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज कराने, नियमित रूप से कचहरी में बैठने और सरकार के निर्देशों का पालन करने के लिए भी तैयार हैं। लेकिन उनकी अपील है कि न्याय मित्रों के बीच आपसी विवाद पैदा करने के बजाय सभी को मिलकर सरकार के सामने मानदेय वृद्धि की मांग रखनी चाहिए। सरकार को भी यह समझना होगा कि केवल बायोमेट्रिक अटेंडेंस से व्यवस्था मजबूत नहीं होगी, बल्कि काम करने वाले कर्मियों की आर्थिक स्थिति और सुविधाओं का ध्यान रखना भी जरूरी है। उनकी मांग है कि बायोमेट्रिक अटेंडेंस के साथ न्याय मित्रों का मानदेय कम से कम 40 से 45 हजार रुपये प्रतिमाह किया जाए, ताकि वे सम्मानपूर्वक अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें और ग्राम कचहरी की जिम्मेदारियां बेहतर तरीके से निभा सकें।

अब सवाल यह है कि क्या बिहार सरकार न्याय मित्रों की इस मांग पर विचार करेगी? क्या 7 हजार रुपये मानदेय पाने वाले न्याय मित्रों को 40 से 45 हजार रुपये तक मानदेय देने की मांग पर कोई फैसला होगा? या फिर बायोमेट्रिक अटेंडेंस को लेकर न्याय मित्रों के बीच यह बहस आगे भी जारी रहेगी?

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