Jagran Prabhat : उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं से समाज के आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्गों के लोगों को नियमित रूप से मुफ्त कानूनी सहायता (Free Legal Aid) उपलब्ध कराने की अपील की है। उन्होंने कहा कि न्याय केवल अदालतों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह समाज के अंतिम व्यक्ति तक आसानी से पहुंचना चाहिए।
मंगलवार को नई दिल्ली में भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.आर. गवई के भाषणों, व्याख्यानों और न्यायिक विचारों पर आधारित पुस्तक 'The Voice of Justice: Justice Gavai Speaks' के विमोचन समारोह को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती न्यायपालिका की निष्पक्षता, संस्थागत ईमानदारी और जनता के विश्वास पर निर्भर करती है।
उन्होंने कहा कि देश की शासन व्यवस्था को समय के साथ बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित होना चाहिए। साथ ही समाज के हाशिए पर रहने वाले गरीब, पिछड़े और वंचित समुदायों को सम्मान और समान अवसर दिलाने के लिए सभी संस्थाओं को मिलकर काम करना होगा।
न्याय केवल अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी
उपराष्ट्रपति ने कहा कि अनुभवी और वरिष्ठ वकीलों की सामाजिक जिम्मेदारी केवल मुकदमे लड़ना नहीं है, बल्कि उन लोगों की भी मदद करना है जो आर्थिक तंगी के कारण न्याय तक नहीं पहुंच पाते। यदि वरिष्ठ अधिवक्ता नियमित रूप से निशुल्क कानूनी सहायता दें, तो देश में न्याय व्यवस्था और अधिक प्रभावी तथा समावेशी बन सकती है।
उन्होंने कहा कि मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं तभी टिकाऊ बनती हैं, जब न्यायिक संयम, संवैधानिक अनुशासन, पारदर्शिता और जनता का भरोसा लगातार बना रहे।
न्यायपालिका की भूमिका पर विशेष जोर
कार्यक्रम में न्यायपालिका की भूमिका, संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय पर भी विस्तार से चर्चा हुई। उपराष्ट्रपति ने कहा कि न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं, बल्कि संविधान के मूल्यों की संरक्षक भी है।उन्होंने न्यायमूर्ति बी.आर. गवई के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि उनके विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेंगे।
क्यों महत्वपूर्ण है मुफ्त कानूनी सहायता?
भारत के संविधान में सभी नागरिकों को समान न्याय का अधिकार दिया गया है। आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को न्याय दिलाने के उद्देश्य से Legal Services Authorities Act, 1987 के तहत मुफ्त कानूनी सहायता की व्यवस्था भी की गई है। उपराष्ट्रपति की यह अपील इसी व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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