जागरण प्रभात, विशेष रिपोर्ट।
देश के कई हिस्सों में चीनी की कीमतों में अचानक तेजी ने आम लोगों की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। कुछ बाजारों में खुदरा चीनी का भाव ₹65 से ₹70 प्रति किलो तक पहुंचने की खबर है। राष्ट्रीय स्तर पर भी कीमतों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 18 अगस्त को देश का औसत खुदरा भाव करीब ₹52.30 प्रति किलो बताया गया, जबकि कुछ बाजारों में कीमत ₹58-60 और उससे ऊपर पहुंच चुकी है।
पिछले कुछ दिनों में कीमतों की तेजी ने सबसे ज्यादा चिंता इसलिए बढ़ाई है क्योंकि चीनी रोजमर्रा की जरूरत की वस्तु है। चाय, मिठाई और घरेलू इस्तेमाल के अलावा बिस्कुट, बेकरी, आइसक्रीम, पेय पदार्थ और दूसरे खाद्य उत्पादों की लागत में भी चीनी का हिस्सा होता है।
एथेनॉल के लिए गन्ना जाने से कितना असर?
चीनी की कीमत बढ़ने के बीच एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने और गन्ने से बने कच्चे माल के डायवर्जन पर बहस तेज हो गई है। उद्योग और बाजार से जुड़ी रिपोर्टों में इसे घरेलू चीनी उपलब्धता पर दबाव डालने वाले कारकों में शामिल किया गया है। कुछ विश्लेषणों के मुताबिक मौजूदा सीजन में चीनी के बराबर मात्रा वाले लगभग 30 लाख टन उत्पादन को एथेनॉल की ओर डायवर्ट किया गया है।
हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार पूरी तेजी को सिर्फ एथेनॉल के कारण समझना सही नहीं होगा। कम उत्पादन, कुछ क्षेत्रों में कमजोर बारिश, सीमित स्टॉक और अगस्त से नवंबर तक बढ़ने वाली त्योहारी मांग भी कीमतों को ऊपर ले जा रही है। Reuters के मुताबिक पिछले एक महीने में घरेलू चीनी कीमतें करीब 10 प्रतिशत बढ़ी थीं और आपूर्ति तंग होने के कारण कीमतों पर दबाव बना हुआ था।
दो-तीन दिनों में अचानक इतनी तेजी क्यों?
बाजार में अचानक तेजी के पीछे केवल उत्पादन का आंकड़ा नहीं, बल्कि भविष्य की उपलब्धता को लेकर बनी चिंता भी काम करती है। त्योहारों से पहले मिठाई और खाद्य उद्योग बड़ी मात्रा में चीनी खरीदता है। इससे थोक बाजार में मांग बढ़ती है।
20 अगस्त की रिपोर्टों के मुताबिक कुछ दिनों में एक्स-मिल कीमतों में करीब ₹10 प्रति किलो की तेजी दर्ज की गई। सरकार ने इसी तेजी को देखते हुए बड़े खरीदारों के स्टॉक पर भी सख्ती की है।
सरकार ने उठाए बड़े कदम
बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह चीनी 31 अक्टूबर तक आयात की जा सकेगी। सरकार का उद्देश्य घरेलू बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति लाकर कीमतों पर दबाव कम करना है।
इसके अलावा बड़े थोक उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक सीमा को भी कड़ा किया गया है। 1 सितंबर से 30 नवंबर तक 10 मीट्रिक टन से ज्यादा मासिक खपत करने वाले थोक उपभोक्ता अधिकतम 15 दिन का स्टॉक रख सकेंगे। इसका उद्देश्य जमाखोरी और कृत्रिम कमी को रोकना है।
नेताओं ने एथेनॉल नीति पर उठाए सवाल
चीनी की महंगाई अब राजनीतिक मुद्दा भी बन गई है। आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने E20 और एथेनॉल नीति पर सवाल उठाते हुए चीनी की कीमतों को गन्ने के एथेनॉल की ओर डायवर्जन से जोड़ा है। दूसरी ओर नीति के समर्थकों का तर्क है कि एथेनॉल पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की दीर्घकालीन नीति का हिस्सा है। इसलिए असली चुनौती एथेनॉल और चीनी की घरेलू उपलब्धता के बीच संतुलन बनाने की है।
आम जनता पर सीधा असर
चीनी की कीमत ₹65-70 किलो तक पहुंचने पर सबसे पहला असर घरेलू बजट पर पड़ता है। कम आय वाले परिवारों के लिए रोजमर्रा की वस्तु में ₹10-15 प्रति किलो की बढ़ोतरी भी महत्वपूर्ण है। दूसरा असर खाद्य कारोबार पर पड़ सकता है। मिठाई दुकानदार, बेकरी और छोटे खाद्य कारोबारी बढ़ी हुई लागत को उत्पादों की कीमत में शामिल कर सकते हैं। त्योहारों के दौरान इसका असर मिठाई और अन्य खाद्य पदार्थों पर दिखाई दे सकता है।
आगे क्या?
सरकार के शुल्क-मुक्त आयात और स्टॉक लिमिट के फैसलों से बाजार में आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद है। लेकिन कीमतें कितनी जल्दी नीचे आती हैं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आयातित चीनी बाजार में कब पहुंचती है, नई पेराई कब शुरू होती है और एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल को लेकर सरकार आगे क्या निर्णय लेती है।

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