जागरण प्रभात।पितृपक्ष में गयाजी का नाम आते ही पिंडदान और तर्पण की परंपरा सामने आती है। लेकिन, गया के प्रेतशिला पर्वत पर होने वाला एक अनुष्ठान ऐसा भी है, जो देश के दूसरे पिंडदान स्थलों से इसे अलग पहचान देता है। यहां पितरों के निमित्त पिंडदान करने के बाद श्रद्धालु सत्तू उड़ाने की परंपरा निभाते हैं।
प्रेतशिला की 676 सीढ़ियां चढ़कर वेदी तक पहुंचने वाले पिंडदानी सत्तू से पिंड तैयार कर पितरों को अर्पित करते हैं। इसके बाद धार्मिक विधि के अनुसार सत्तू उड़ाया जाता है। मान्यता है कि यह कर्म उन पूर्वजों की शांति और मुक्ति की कामना से जुड़ा है, जिनका निधन असामयिक या अकाल मृत्यु के रूप में हुआ हो। यह धार्मिक आस्था और परंपरा का विषय है।
प्रेतशिला पर सत्तू उड़ाने की परंपरा क्या है?
प्रेतशिला में पिंडदान की प्रक्रिया सामान्य पिंडदान से कुछ अलग मानी जाती है। श्रद्धालु पहले ब्रह्मसरोवर में स्नान और तर्पण करते हैं। इसके बाद 676 सीढ़ियों की चढ़ाई कर प्रेतशिला वेदी तक पहुंचते हैं।
यहां पितरों के निमित्त सत्तू से पिंड तैयार कर अर्पित करने की परंपरा है। पिंडदान के बाद सत्तू उड़ाने का विधान किया जाता है। धार्मिक मान्यता में इसे पितरों की मुक्ति की कामना से जोड़ा जाता है।
सत्तू ही क्यों बना इस परंपरा का हिस्सा?
प्रेतशिला की परंपरा को समझने के लिए यहां प्रचलित धार्मिक मान्यताओं को समझना जरूरी है। स्थानीय धार्मिक परंपरा में सत्तू को पिंड के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और पिंडदान के बाद इसे उड़ाने की रस्म निभाई जाती है।
कुछ स्थानीय परंपराओं में इसे अकाल मृत्यु वाले पितरों के श्राद्ध से जोड़ा जाता है। मान्यता के अनुसार पिंडदान और सत्तू उड़ाने के माध्यम से ऐसे पितरों के लिए शांति और सद्गति की प्रार्थना की जाती है। इन मान्यताओं का आधार धार्मिक परंपरा है, इसलिए इन्हें आस्था के संदर्भ में ही समझना चाहिए।
‘उड़ल सत्तू पितर को पैठ हो’ की मान्यता
प्रेतशिला से जुड़ी स्थानीय धार्मिक परंपरा में सत्तू उड़ाते समय विशेष वाक्य बोलने की मान्यता भी मिलती है। स्थानीय पंडा परंपरा में इसे पितरों तक सत्तू के पहुंचने और उनकी मुक्ति की कामना के प्रतीक के रूप में समझाया जाता है। कुछ विवरणों में धर्मशिला की परिक्रमा के साथ इस रस्म का उल्लेख मिलता है। यह परंपरा प्रेतशिला को गया के अन्य पिंडदान स्थलों से अलग धार्मिक पहचान देती है।
प्रेतशिला पर किसके लिए किया जाता है पिंडदान?
धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रेतशिला वेदी का विशेष संबंध अकाल मृत्यु को प्राप्त पूर्वजों के निमित्त किए जाने वाले श्राद्ध और पिंडदान से माना जाता है। इसी वजह से पितृपक्ष के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने ऐसे पूर्वजों के लिए पिंडदान करने पहुंचते हैं। हालांकि अकाल मृत्यु और पितरों की मुक्ति से जुड़ी बातें धार्मिक मान्यताएं हैं, इन्हें प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
676 सीढ़ियां चढ़कर क्यों पहुंचते हैं श्रद्धालु?
प्रेतशिला वेदी तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को पहाड़ी की करीब 676 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। पितृपक्ष के दौरान सुबह से ही यहां पिंडदानियों का पहुंचना शुरू हो जाता है। कई श्रद्धालु पूरी चढ़ाई पैदल पूरी करते हैं। बुजुर्ग और शारीरिक रूप से असमर्थ तीर्थयात्रियों के लिए डोली-खटोली का सहारा लिया जाता है। 2026 के पितृपक्ष मेले के दौरान भी प्रेतशिला पर रोपवे की सुविधा उपलब्ध नहीं है, इसलिए श्रद्धालु सीढ़ियों या डोली-खटोली से वेदी तक पहुंच रहे हैं।
प्रेतशिला का धार्मिक महत्व क्या है?
गयाजी में पिंडदान की परंपरा प्राचीन धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है। प्रेतशिला भी गया की प्रमुख पिंडवेदियों में शामिल है। स्थानीय धार्मिक परंपराओं और पुराणों से जुड़े विवरणों में इस स्थान को विशेष महत्व दिया गया है। पितृपक्ष के दौरान यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रेतशिला केवल एक पहाड़ी नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और उनके लिए शांति की प्रार्थना करने का धार्मिक स्थल है।
सत्तू उड़ाने के पीछे छिपा भाव
अगर इस पूरी परंपरा को सरल शब्दों में समझें तो सत्तू उड़ाना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पितरों के प्रति श्रद्धा और उनके मोक्ष की कामना से जुड़ा प्रतीकात्मक धार्मिक कर्म है। पिंडदान के माध्यम से श्रद्धालु अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं और सत्तू उड़ाने की परंपरा के माध्यम से उनकी मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। यही वजह है कि पितृपक्ष में प्रेतशिला पर होने वाला यह अनुष्ठान श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है।
पितृपक्ष में प्रेतशिला क्यों बनती है आकर्षण का केंद्र?
गया में पितृपक्ष के दौरान देश के अलग-अलग राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। 2026 में भी प्रेतशिला पर सुबह से पिंडदानियों की भीड़ देखने को मिली। ब्रह्मसरोवर में तर्पण के बाद श्रद्धालु पहाड़ी पर स्थित वेदी तक पहुंचे और अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्धकर्म किया। प्रेतशिला की कठिन चढ़ाई, पिंडदान की परंपरा और सत्तू उड़ाने की अनोखी धार्मिक विधि इसे गया के पितृपक्ष अनुष्ठानों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है।

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