जागरण प्रभात। नेपाल के प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते जलवायु संकट को लेकर बड़ा क्षेत्रीय प्रस्ताव रखा है। गुरुवार, 24 सितंबर को अपने पहले UN संबोधन में शाह ने नेपाल, भारत और चीन के नेतृत्व में ‘Himalayan Climate Resilience Mechanism’ (हिमालयी जलवायु लचीलापन तंत्र) स्थापित करने का प्रस्ताव दिया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन सीमाओं को नहीं पहचानता और हिमालय में आने वाली आपदाओं से निपटने के लिए क्षेत्रीय सहयोग जरूरी है।
शाह ने अपने संबोधन में नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी भोटेकोशी-त्रिशूली बाढ़ को केवल नेपाल की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे हिमालय के लिए चेतावनी बताया। उन्होंने कहा कि बढ़ते तापमान से हिमालय का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहा है। ग्लेशियरों के पीछे हटने, पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने और पर्वतीय ढलानों के अस्थिर होने से बाढ़, भूस्खलन और अन्य आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है।
भारत और चीन के साथ मिलकर क्या होगा?
प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने प्रस्तावित तंत्र के तहत उपग्रह डेटा और विशेषज्ञता साझा करने की बात कही। इसके साथ ही उन्होंने खतरनाक ग्लेशियर झीलों की निगरानी, साझा प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने और आपदा के समय सीमापार राहत एवं सहायता के बेहतर समन्वय का सुझाव दिया। शाह के मुताबिक, हिमालय को अलग-अलग देशों के बीच बिखरी सूचनाओं वाले क्षेत्र के बजाय अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रयोगशाला बनाया जाना चाहिए। उनका कहना था कि हिमालयी क्षेत्र की प्राकृतिक आपदाएं किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं रहतीं, इसलिए उनका मुकाबला भी मिलकर किया जाना चाहिए।
‘हिमालय पृथ्वी की लाइफ-सपोर्ट सिस्टम का हिस्सा’
शाह ने हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इस क्षेत्र से करीब दो अरब लोगों को पानी, कृषि, पारिस्थितिकी तंत्र और आजीविका से जुड़ी सहायता मिलती है। उन्होंने कहा कि हिमालय पृथ्वी का कोई हाशिए का क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह ग्रह की जीवन-समर्थन प्रणाली का हिस्सा है। उनका तर्क था कि हिमालय में होने वाला बदलाव केवल नेपाल, भारत या चीन की समस्या नहीं है। इसका असर पानी, कृषि, ऊर्जा, जैव विविधता और करोड़ों लोगों की आजीविका पर पड़ सकता है।
नेपाल की विनाशकारी बाढ़ ने बढ़ाई चिंता
26 अगस्त को नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में भोटेकोशी नदी से जुड़ी भीषण बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी। रासुवा, नुवाकोट, धादिंग सहित कई इलाकों में घरों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान हुआ। राहत और खोज अभियान के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने और लापता होने की जानकारी सामने आई। नेपाल पुलिस के 23 सितंबर के अपडेट में 1,452 शव बरामद होने और 4,718 लोगों के लापता होने की जानकारी दी गई थी। बाद के अपडेट में शवों की संख्या 1,453 तक पहुंचने की सूचना सामने आई। वहीं, UN में अपने भाषण में शाह ने कहा कि कम से कम 1,400 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और 6,000 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं। उन्होंने कहा कि नेपाल के सामने अब बड़े पैमाने पर राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण की चुनौती है।
GDP के करीब 10 प्रतिशत तक हो सकता है पुनर्निर्माण खर्च
प्रधानमंत्री शाह ने संयुक्त राष्ट्र में कहा कि प्रारंभिक आकलन के अनुसार नेपाल को भौतिक पुनर्प्राप्ति और पुनर्निर्माण के लिए GDP के करीब 10 प्रतिशत के बराबर संसाधनों की आवश्यकता हो सकती है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से नेपाल के पुनर्निर्माण और जलवायु अनुकूलन में सहयोग की अपील की। बाद के आकलनों में नेपाल की पुनर्निर्माण जरूरत करीब 4.77 अरब डॉलर बताई गई है। यह राशि प्रभावित बुनियादी ढांचे और संपत्तियों के पुनर्निर्माण एवं रिकवरी से जुड़ी है।
भारत और चीन को लेकर शाह ने क्या कहा?
शाह ने आपदा के बाद सहायता देने के लिए भारत और चीन सहित विभिन्न देशों का आभार जताया। उन्होंने कहा कि दोनों पड़ोसी देशों ने तत्काल सहायता उपलब्ध कराई। संयुक्त राष्ट्र प्रणाली, मानवीय सहायता एजेंसियों, परोपकारी संस्थाओं और दुनिया के लोगों की मदद का भी उन्होंने उल्लेख किया। इसी संदर्भ में उन्होंने आपदा प्रबंधन को लेकर नेपाल, भारत और चीन के बीच स्थायी क्षेत्रीय सहयोग का प्रस्ताव रखा। इसका उद्देश्य सिर्फ आपदा आने के बाद राहत पहुंचाना नहीं, बल्कि आपदा से पहले जोखिम की पहचान और समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था को मजबूत करना है।
‘जलवायु परिवर्तन सीमाओं को नहीं पहचानता’
शाह ने अपने भाषण में जलवायु परिवर्तन और वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था के बीच संबंध पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि एक तरफ ग्लेशियर पिघल रहे हैं, फसलें प्रभावित हो रही हैं और अचानक बाढ़ आ रही है, जबकि दूसरी तरफ गरीब देशों के लोग ऐसी परिस्थितियों की कीमत चुका रहे हैं जिनके लिए वे स्वयं जिम्मेदार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि नेपाल जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए जलवायु आपदाएं केवल मानवीय संकट नहीं हैं, बल्कि विकास का संकट भी हैं। सड़कों, पुलों, स्कूलों, घरों, खेतों और आजीविका के नष्ट होने से वर्षों की विकास प्रक्रिया पीछे जा सकती है।
नेपाल के लिए छह शब्दों पर जोर
प्रधानमंत्री शाह ने UN में नेपाल की आगे की जरूरतों को छह शब्दों में रखने की बात कही—Relief, Rehabilitation, Reconstruction और Responsibility, Reparation, Resilience यानी राहत, पुनर्वास, पुनर्निर्माण के साथ जिम्मेदारी, क्षतिपूर्ति और लचीलापन। उन्होंने कहा कि आपदा के बाद तत्काल राहत और पुनर्निर्माण जरूरी है, लेकिन भविष्य की आपदाओं के जोखिम को कम करने के लिए जलवायु अनुकूलन और क्षेत्रीय सहयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह प्रस्ताव?
हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक Mistry के कारण नेपाल में होने वाली ग्लेशियर, बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं का असर सीमापार भी पड़ सकता है। इसलिए शाह का प्रस्ताव केवल नेपाल की आपदा प्रतिक्रिया व्यवस्था तक सीमित नहीं है। इसमें भारत और चीन के साथ डेटा साझा करने, ग्लेशियरों की निगरानी और शुरुआती चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने की बात शामिल है। शाह ने अपने भाषण के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की कि हिमालय में बदलता पर्यावरण पूरे क्षेत्र की जल, खाद्य, ऊर्जा और आजीविका सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है।
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