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Daudnagar Jitiya: 200 साल पुरानी परंपरा, जितिया पर पूरा दाउदनगर बन जाता है लोकमंच


जागरण प्रभात। बिहार में जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत संतान की लंबी आयु, सुख और मंगल की कामना से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है। लेकिन औरंगाबाद जिले के दाउदनगर में यही पर्व एक अलग सांस्कृतिक रूप ले लेता है। यहां जितिया केवल पूजा और व्रत तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कई दिनों तक चलने वाली ऐसी लोकपरंपरा बन जाती है, जिसमें शहर के चौक, गलियां और मोहल्ले ही रंगमंच का रूप ले लेते हैं।

दाउदनगर की जिउतिया परंपरा को स्थानीय स्तर पर करीब डेढ़ से दो शताब्दी पुरानी लोक-संस्कृति से जोड़ा जाता है। इसके इतिहास को लेकर अलग-अलग स्थानीय मान्यताएं हैं और इसकी शुरुआत का एक सर्वमान्य लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। स्थानीय गीतों और जनश्रुतियों में विक्रम संवत 1917 यानी करीब 1860 का उल्लेख मिलता है। कुछ स्थानीय परंपराएं इससे भी पहले इसके आरंभ की बात करती हैं।

जितिया के दिन दाउदनगर में क्या-क्या होता है?

दाउदनगर की जितिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां पर्व का रंग केवल पूजा स्थल तक नहीं रहता। अलग-अलग मोहल्लों और चौक-चौराहों पर पारंपरिक गतिविधियां दिखाई देती हैं। स्थानीय कलाकार विभिन्न पात्रों का रूप धारण कर नकल-अभिनय, स्वांग, लोकगीत, झूमर और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां करते हैं। जीमूतवाहन चौक को दाउदनगर की जितिया संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। इसके अलावा पटवा टोली के इमली तल चौक, बम रोड, कसेरा टोली और पुराने शहर के कई हिस्सों में भी आयोजन होते हैं। 2026 में इन स्थानों पर पारंपरिक प्रस्तुतियों और नकल-अभिनय की तैयारी की गई है।

ओखली रखने से शुरू होती है खास परंपरा

दाउदनगर की जितिया परंपरा में ओखली रखना भी महत्वपूर्ण माना जाता है। 2026 में पटवा टोली स्थित इमली तल के जितिया स्थल पर पर्व को लेकर ओखली रखने की तैयारी पूरी की गई थी। इसके बाद आयोजन से जुड़ी पारंपरिक गतिविधियां शुरू होती हैं। यही छोटी-छोटी परंपराएं दाउदनगर की जितिया को केवल धार्मिक आयोजन न रहकर स्थानीय सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा बनाती हैं।

चार प्रमुख चौकों पर होती है जीमूतवाहन की पूजा

दाउदनगर में भगवान जीमूतवाहन की पूजा जितिया पर्व का धार्मिक केंद्र है। स्थानीय परंपरा के अनुसार शहर के चार प्रमुख चौकों पर जीमूतवाहन से जुड़ी पूजा-अर्चना और आयोजन होते हैं। पर्व के अंतिम दिनों में यहां सांस्कृतिक गतिविधियां और अधिक बढ़ जाती हैं तथा बड़ी संख्या में लोग इन्हें देखने पहुंचते हैं। जीमूतवाहन की कथा जीवित्पुत्रिका व्रत की धार्मिक मान्यता से जुड़ी है। माताएं संतान की लंबी आयु और कल्याण की कामना से यह व्रत करती हैं।

नकल-अभिनय है दाउदनगर जितिया की सबसे अलग पहचान

दाउदनगर की जितिया को दूसरी जगहों से अलग पहचान देने वाली परंपराओं में नकल-अभिनय सबसे प्रमुख है। कलाकार अलग-अलग पात्रों का रूप धारण करके गलियों और चौक-चौराहों पर प्रस्तुतियां देते हैं। कहीं हास्य और व्यंग्य दिखाई देता है तो कहीं लोककथा, सामाजिक प्रसंग और धार्मिक पात्रों पर आधारित अभिनय। यही वजह है कि जितिया के दौरान दाउदनगर का वातावरण एक खुले लोकमंच जैसा नजर आता है। स्थानीय परंपरा में राजा-रानी, विभिन्न लोक पात्रों और धार्मिक चरित्रों के स्वांग के साथ झांकी, लोकनृत्य और पारंपरिक गीत-संगीत भी देखने को मिलते हैं।

झूमर और लोकगीतों में दर्ज है जितिया का इतिहास

दाउदनगर की जिउतिया केवल मंच पर होने वाले कार्यक्रमों की कहानी नहीं है। इसकी स्मृतियां स्थानीय लोकगीतों में भी सुरक्षित हैं। स्थानीय रूप से प्रचलित झूमर गीतों में जितिया की शुरुआत और पुराने समय के आयोजन का उल्लेख मिलता है। यही लोकगीत इस बात की ओर संकेत करते हैं कि यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है।लिखित दस्तावेज सीमित होने के बावजूद लोकगीत, बुजुर्गों की स्मृतियां और स्थानीय परंपराएं दाउदनगर की जितिया की सांस्कृतिक यात्रा को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

क्यों कहा जाता है कि जितिया में पूरा दाउदनगर बन जाता है रंगमंच?

आमतौर पर किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए एक निर्धारित मंच होता है। दाउदनगर की जितिया में स्थिति कुछ अलग है। यहां शहर के कई मोहल्ले और चौक स्वयं प्रस्तुति स्थल बन जाते हैं। शाम के समय लोगों की आवाजाही बढ़ती है। कलाकार अपनी तैयारियों के साथ निकलते हैं और दर्शक जगह-जगह रुककर प्रस्तुतियां देखते हैं। इस तरह धार्मिक पर्व के साथ शहर का सामाजिक जीवन भी उत्सव में शामिल हो जाता है। इसी विशेषता के कारण दाउदनगर की जितिया को स्थानीय लोग अपनी लोक-सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानते हैं। जिलाधिकारी अभिलाषा शर्मा ने भी 2026 के आयोजन के दौरान इसे दाउदनगर की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी परंपरा बताया।

2026 में दाउदनगर की जितिया को मिला नया पहचान-पटल

इस वर्ष दाउदनगर की ऐतिहासिक जितिया परंपरा के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग और औरंगाबाद जिला प्रशासन के सहयोग से जितिया लोक उत्सव-2026 का आयोजन किया गया और इसे बिहार के सांस्कृतिक कैलेंडर में जगह मिली। रिपोर्टों के अनुसार सरकार की ओर से इस लोक उत्सव के लिए तीन लाख रुपये की राशि भी आवंटित की गई है। दो अक्टूबर 2026 को इसके सरकारी आयोजन की शुरुआत की गई। इसके बाद स्थानीय स्तर पर पारंपरिक जितिया कार्यक्रम अपने पुराने स्वरूप में जारी रहने हैं।

धार्मिक व्रत से लोकउत्सव तक का सफर

जितिया का मूल धार्मिक स्वरूप माताओं के व्रत और संतान के मंगल की कामना से जुड़ा है। लेकिन दाउदनगर ने इस पर्व के साथ अपनी लोककलाओं को जोड़कर इसे विशिष्ट रूप दे दिया। यहां पूजा के साथ लोकगीत हैं, व्रत के साथ सामुदायिक भागीदारी है और धार्मिक आस्था के साथ अभिनय तथा लोक-संस्कृति भी है। यही मिश्रण दाउदनगर की जितिया को बिहार के दूसरे स्थानों पर मनाए जाने वाले सामान्य जितिया पर्व से अलग सांस्कृतिक पहचान देता है।

नई पीढ़ी के लिए विरासत बचाने का अवसर

दाउदनगर की जितिया की सबसे बड़ी विशेषता केवल इसकी पुरानी उम्र नहीं, बल्कि इसका पीढ़ियों तक जीवित रहना है। आज जब मनोरंजन और सांस्कृतिक गतिविधियों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, तब ऐसी लोकपरंपराएं नई पीढ़ी को अपने शहर के इतिहास और संस्कृति से जोड़ने का माध्यम बन सकती हैं। 2026 में सरकारी सांस्कृतिक कैलेंडर में स्थान मिलने के बाद इस परंपरा को दस्तावेजित करने, स्थानीय कलाकारों को मंच देने और आने वाली पीढ़ियों तक इसकी जानकारी पहुंचाने का अवसर भी बढ़ा है।

दाउदनगर की जितिया का सार

दाउदनगर में जितिया सिर्फ एक व्रत नहीं है। यह आस्था, लोकगीत, नकल-अभिनय, झूमर, सामुदायिक भागीदारी और पुरानी लोकपरंपराओं का ऐसा संगम है, जिसमें पर्व के दिनों में शहर की गलियां ही सांस्कृतिक मंच बन जाती हैं। यही वजह है कि औरंगाबाद का दाउदनगर अपनी जितिया के लिए बिहार की विशिष्ट लोक-सांस्कृतिक पहचान के रूप में जाना जाता है। 

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