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Jitiya 2026: संतान की रक्षा और दीर्घायु की कामना का पर्व है जितिया

 

जागरण प्रभात। संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए मनाया जाने वाला जितिया पर्व बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और नेपाल के कुछ क्षेत्रों में विशेष आस्था के साथ मनाया जाता है। इस पर्व को जीवित्पुत्रिका व्रत या जिउतिया के नाम से भी जाना जाता है। माताएं अपनी संतान की सलामती और दीर्घायु के लिए इस कठिन व्रत को करती हैं। तीन दिनों तक चलने वाले इस पर्व में नहाय-खाय से शुरुआत होती है, जिसके बाद व्रती महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और फिर पारण के साथ पर्व का समापन होता है।

इस वर्ष जितिया पर्व को लेकर घरों में तैयारियां शुरू हो गई हैं। शुक्रवार को नहाय-खाय की परंपरा निभाई गई, जबकि शनिवार को जितिया व्रत रखा जाएगा। पर्व को लेकर बाजारों में भी चहल-पहल बढ़ गई है। महिलाएं पूजा और पारंपरिक प्रसाद के लिए आवश्यक सामग्री की खरीदारी कर रही हैं।

क्या है जितिया पर्व?

जितिया हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण लोकपर्व है, जिसे मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान के लिए मनाती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन व्रत रखने से संतान की रक्षा होती है और उसे लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य तथा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस व्रत को जीवित्पुत्रिका व्रत इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें माताएं अपने जीवित पुत्र-पुत्रियों की मंगलकामना करती हैं। समय के साथ यह पर्व केवल पुत्र तक सीमित नहीं रहा और कई परिवारों में माताएं अपनी सभी संतानों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य के लिए यह व्रत रखती हैं।जितिया पर्व की सबसे खास बात इसका कठिन व्रत है। कई स्थानों पर महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं। यानी व्रत के दौरान भोजन के साथ पानी भी ग्रहण नहीं किया जाता। इसी कारण इसे कठिन व्रतों में शामिल किया जाता है।

आज क्यों मनाया जा रहा है नहाय-खाय?

जितिया पर्व की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इस दिन व्रती महिलाएं स्नान कर शुद्धता के साथ भोजन ग्रहण करती हैं। इसके बाद अगले दिन मुख्य व्रत रखा जाता है। नहाय-खाय केवल भोजन करने की परंपरा नहीं है, बल्कि इसके पीछे शारीरिक और मानसिक शुद्धता की धार्मिक भावना जुड़ी हुई है। महिलाएं स्नान के बाद पूजा-अर्चना करती हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। इसके बाद व्रत के लिए स्वयं को तैयार करती हैं। बिहार और पूर्वांचल के कई इलाकों में नहाय-खाय के दिन पारंपरिक भोजन बनाने की परंपरा है। परिवार की महिलाएं पर्व की तैयारियों में जुट जाती हैं और घर में विशेष पकवान तथा प्रसाद की सामग्री तैयार की जाती है।

शनिवार को जितिया व्रत

नहाय-खाय के अगले दिन मुख्य जितिया व्रत रखा जाएगा। इस दिन व्रती महिलाएं संतान की लंबी आयु और उसके सुखी जीवन की कामना करते हुए व्रत करती हैं। सुबह से ही महिलाएं पूजा की तैयारी शुरू कर देती हैं। कई जगहों पर महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा करती हैं और जितिया माता की कथा सुनती हैं। पूजा के दौरान संतान की मंगलकामना की जाती है। जितिया व्रत में जिमूतवाहन की पूजा और उनसे जुड़ी कथा का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक परंपरा में जिमूतवाहन को त्याग, करुणा और परोपकार का प्रतीक माना जाता है। उनकी कथा मातृत्व की भावना और संतान की रक्षा के संकल्प से जुड़ी हुई है।

जितिया की कथा में क्या है?

जितिया से जुड़ी धार्मिक कथाओं में जिमूतवाहन का विशेष उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि जिमूतवाहन ने एक नाग के पुत्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों का त्याग करने का संकल्प लिया था। उनकी करुणा और त्याग से प्रभावित होकर नाग की रक्षा हुई। इसी कथा को माताएं अपनी संतान की रक्षा और दीर्घायु की कामना से जोड़कर देखती हैं। यही वजह है कि जितिया पर्व में जिमूतवाहन की पूजा और कथा श्रवण की परंपरा चली आ रही है।हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में जितिया से जुड़ी लोककथाओं और पूजा-पद्धतियों में कुछ अंतर देखने को मिलता है, लेकिन सभी परंपराओं का मूल भाव संतान की मंगलकामना और उसकी रक्षा है।

जितिया पर्व का धार्मिक महत्व

जितिया पर्व केवल एक व्रत नहीं बल्कि मां और संतान के बीच भावनात्मक संबंध का प्रतीक माना जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान के अच्छे स्वास्थ्य, लंबी आयु और सुखी जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं। बिहार में इस पर्व का विशेष सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरों तक महिलाएं इसे पारंपरिक तरीके से मनाती हैं। कई जगहों पर महिलाएं एक साथ बैठकर पूजा करती हैं, लोकगीत गाती हैं और जितिया की कथा सुनती हैं। इस पर्व के माध्यम से लोकसंस्कृति की कई परंपराएं भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती हैं।

व्रत के दौरान किन बातों का रखा जाता है ध्यान?

जितिया व्रत को कठिन व्रत माना जाता है। पारंपरिक रूप से व्रती महिलाएं व्रत के दौरान भोजन और पानी का त्याग करती हैं। इसलिए व्रत से पहले पर्याप्त आराम और शरीर को तैयार रखने पर विशेष ध्यान दिया जाता है। हालांकि निर्जला व्रत हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं हो सकता। गर्भवती महिलाओं, बीमार लोगों, बुजुर्गों या ऐसी महिलाओं जिन्हें नियमित दवा की आवश्यकता होती है, उन्हें व्रत रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है। धार्मिक आस्था के साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है।

जितिया में पारंपरिक प्रसाद का महत्व

जितिया पर्व में क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग प्रकार के पारंपरिक भोजन और प्रसाद बनाए जाते हैं। पर्व की तैयारियों में महिलाएं पहले से ही आवश्यक सामग्री जुटाने लगती हैं। कई इलाकों में स्थानीय फल, सब्जियां और पारंपरिक व्यंजन पूजा का हिस्सा होते हैं। परिवार के सदस्य भी व्रती महिला की सहायता करते हैं ताकि पूजा की सभी तैयारियां समय पर पूरी हो सकें।

कब होता है जितिया का पारण?

मुख्य जितिया व्रत के बाद अगले दिन पारण किया जाता है। व्रती महिलाएं पूजा-अर्चना और निर्धारित धार्मिक परंपराओं को पूरा करने के बाद व्रत खोलती हैं। पारण का समय स्थानीय पंचांग और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। इसलिए व्रत रखने वाली महिलाओं को अपने क्षेत्र के मान्य पंचांग या स्थानीय पुरोहित से पारण का सही समय जान लेना चाहिए।

बिहार में जितिया को लेकर उत्साह

बिहार में जितिया पर्व का विशेष उत्साह देखने को मिलता है। खासकर ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में महिलाएं कई दिन पहले से इसकी तैयारी शुरू कर देती हैं। बाजारों में फल, पूजा सामग्री और पर्व से जुड़ी अन्य वस्तुओं की मांग बढ़ जाती है। घर-घर में पर्व को लेकर विशेष माहौल रहता है। माताएं अपनी संतानों के लिए व्रत रखती हैं और परिवार के लोग उनकी पूजा की तैयारियों में सहयोग करते हैं। जितिया का संदेश केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यह पर्व मां के त्याग, प्रेम और संतान के प्रति उसकी चिंता को भी अभिव्यक्त करता है। यही भाव इसे बिहार और पूर्वांचल की लोकसंस्कृति में एक विशेष स्थान देता है। आज नहाय-खाय के साथ जितिया पर्व की शुरुआत हो रही है और शनिवार को माताएं संतान की लंबी उम्र एवं सुख-समृद्धि की कामना के साथ मुख्य व्रत रखेंगी। इसके बाद पारंपरिक विधि से पूजा-अर्चना और पारण के साथ पर्व का समापन होगा।

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