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Bihar : भागलपुर-बरारी-नवगछिया रेल कनेक्टिविटी की जरूरत, विक्रमशिला सेतु के सामने बने रेल-सड़क पुल तो बदल सकता है सीमांचल और कोसी का सफर

जागरण प्रभात। कभी भागलपुर से बरारी और फिर गंगा पार कर महादेवपुर होते हुए बिहपुर तक रेल-स्टीमर का जो नेटवर्क उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ता था, वह अब इतिहास का हिस्सा है। लेकिन, बदलते समय में उसी पुराने परिवहन गलियारे को आधुनिक रेल-सड़क कनेक्टिविटी से सीमांचल का सफर आसान किया जा सकता है।भागलपुर के बरारी घाट से गंगा पार नवगछिया क्षेत्र को जोड़ते हुए रेल और सड़क का नया संपर्क मार्ग, यदि भविष्य में आकार लेता है, तो इसका असर केवल भागलपुर और नवगछिया तक सीमित नहीं रहेगा। इससे पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज समेत सीमांचल और कोसी के जिलों तक भागलपुर की सीधी रेल कनेक्टिविटी विकसित करने की दिशा में एक वैकल्पिक गलियारा तैयार हो सकता है।सरकार को चाहिए कि बरारी-नवगछिया रेल लाइन या गंगा पर नए रेल-सड़क पुल को स्वीकृत परियोजना के रूप में घोषित किया जाए। 

कभी बरारी से चलती थी रेल, फिर गंगा पार कर जाती थी यात्रा

विक्रमशिला सेतु के निर्माण से पहले भागलपुर और उत्तर बिहार के बीच आवागमन का एक महत्वपूर्ण माध्यम बरारी घाट था। यात्रियों को भागलपुर से छोटी लाइन की ट्रेन के जरिए बरारी घाट तक पहुंचना होता था। इसके बाद स्टीमर से गंगा पार कर महादेवपुर घाट पहुंचते थे और वहां से रेल के जरिए थाना बिहपुर तथा आगे के इलाकों की यात्रा होती थी। उपलब्ध ऐतिहासिक रिपोर्टों के मुताबिक बिहपुर-लत्तीपुर-महादेवपुर घाट के बीच मीटर गेज रेल सेवा 1906 के आसपास शुरू हुई थी। गंगा के दोनों किनारों की रेल और स्टीमर व्यवस्था मिलकर उस दौर में एक महत्वपूर्ण परिवहन नेटवर्क बनाती थी। यानी आज जिस तरह भागलपुर और नवगछिया को सीधे और तेज रेल संपर्क से जोड़ने की जरूरत महसूस की जा रही है, उसका एक ऐतिहासिक आधार पहले से मौजूद रहा है।

1951 में बना था बरारी का पक्का स्टेशन

स्वतंत्रता के बाद बरारी में 1951 में पक्का रेलवे स्टेशन भवन बनाया गया था। यहां टिकट काउंटर, रेलवे से जुड़ी सुविधाएं और रेलवे पुलिस की व्यवस्था भी थी। लंबे समय तक यह स्थान यात्रियों की आवाजाही का प्रमुख केंद्र रहा। लेकिन, सड़क संपर्क के विस्तार और विक्रमशिला सेतु के निर्माण के बाद बरारी की रेल-स्टीमर व्यवस्था धीरे-धीरे समाप्त हो गई। बाद में स्टेशन परिसर और पुरानी रेल संरचनाएं उपयोग से बाहर हो गईं।

75 साल पुराना बरारी स्टेशन अब इतिहास

जुलाई 2026 में बरारी के पुराने रेलवे स्टेशन भवन को ध्वस्त कर दिया गया। रिपोर्टों के अनुसार, यहां अब संग्रहालय बनाने की योजना है, ताकि इस क्षेत्र की पुरानी रेल और परिवहन विरासत को संरक्षित किया जा सके। यह घटनाक्रम अपने आप में महत्वपूर्ण है। एक तरफ पुरानी रेल व्यवस्था की इमारत खत्म हुई, तो दूसरी तरफ उसी बरारी क्षेत्र की जमीन और परिवहन गलियारे को भविष्य की कनेक्टिविटी के नजरिए से देखने की ज रूरत है। 

अब बरारी से नवगछिया तक रेल जोड़ने का सवाल

आज भागलपुर के सामने सबसे बड़ा सवाल केवल शहर के भीतर यातायात का नहीं, बल्कि गंगा के उत्तर और दक्षिण किनारों को बेहतर तरीके से जोड़ने का भी है। यदि भविष्य में बरारी घाट के सामने गंगा पर नया रेल-सड़क पुल बनाया जाता है और इसे नवगछिया क्षेत्र की रेल लाइन से जोड़ा जाता है, तो भागलपुर से उत्तर बिहार की ओर एक नया रेल कॉरिडोर विकसित किया जा सकता है। इसका संभावित लाभ यह होगा कि भागलपुर से नवगछिया होते हुए कोसी और सीमांचल क्षेत्र की ओर जाने वाली रेल कनेक्टिविटी को वैकल्पिक मार्ग मिल सकता है। इससे यात्रियों, व्यापार, कृषि उत्पादों और माल परिवहन के लिए नया रास्ता खुलने की संभावना बन सकती है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह अभी एक प्रस्तावित कनेक्टिविटी मॉडल है, स्वीकृत रेल परियोजना नहीं।

विक्रमशिला सेतु के सामने रेल-सड़क पुल क्यों महत्वपूर्ण हो सकता है?

विक्रमशिला सेतु भागलपुर को नवगछिया और आगे उत्तर बिहार से जोड़ने वाला प्रमुख संपर्क मार्ग है। 2026 में पुल पर आई समस्या के दौरान बरारी-महादेवपुर के बीच जलमार्ग का इस्तेमाल भी करना पड़ा, जिससे एक बार फिर इस गंगा पार संपर्क की अहमियत सामने आई।

ऐसे में भविष्य के लिए एक मल्टी-मोडल कनेक्टिविटी मॉडल पर विचार किया जा सकता है।

भागलपुर → बरारी → गंगा पर रेल-सड़क पुल → महादेवपुर/नवगछिया क्षेत्र → बिहपुर → कोसी क्षेत्र → सीमांचल

ऐसा गलियारा तैयार होने पर भागलपुर की भौगोलिक स्थिति का इस्तेमाल उत्तर बिहार की ओर बेहतर संपर्क के लिए किया जा सकता है।

सीमांचल और कोसी से सीधा संपर्क होने की संभावना

पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज को आम तौर पर बिहार के सीमांचल क्षेत्र के जिलों के रूप में जाना जाता और सहरसा, मधेपुरा, सुपौल कोसी के रूप में।  भागलपुर से इस क्षेत्र का सीधा और तेज रेल संपर्क बनने से यात्रियों को वैकल्पिक यात्रा मार्ग मिल सकता है। इसका महत्व केवल यात्रियों के लिए नहीं होगा। भागलपुर का व्यापारिक बाजार, कृषि क्षेत्र, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और औद्योगिक गतिविधियां भी इस तरह के संपर्क से व्यापक क्षेत्र से जुड़ सकती हैं।

भागलपुर को पहले ही मिल चुका है 13.38 किमी रेल बाईपास

भागलपुर के रेल नेटवर्क में एक और महत्वपूर्ण बदलाव पहले ही स्वीकृत हो चुका है। रेल मंत्रालय ने 13.38 किलोमीटर लंबे भागलपुर बाईपास रेल मार्ग को मंजूरी दी है। परियोजना की अनुमानित लागत ₹303.20 करोड़ है। सरकारी जानकारी के अनुसार यह बाईपास सबौर और गोनूधाम क्षेत्र को जोड़ने वाली नई रेल कड़ी के रूप में विकसित किया जाएगा। इसका उद्देश्य भागलपुर जंक्शन पर परिचालन दबाव कम करना और ट्रेनों के संचालन को अधिक सुगम बनाना है।इसलिए भागलपुर के रेल नेटवर्क का भविष्य केवल मौजूदा स्टेशन के विस्तार तक सीमित नहीं है। बाईपास, दोहरीकरण और नई कनेक्टिविटी परियोजनाएं मिलकर आने वाले वर्षों में पूरे क्षेत्र के रेल मानचित्र को बदल सकती हैं।

बरारी की जमीन पर भी बदल रही है रेलवे की योजना

बरारी की पुरानी छोटी लाइन वाले क्षेत्र में रेलवे ने पहले शंटिंग लाइन और रैक स्टेबलिंग की योजना पर काम किया था। लेकिन, सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक अब इस योजना में बदलाव किया गया है। नई योजना के तहत चौधरीडीह में चार शंटिंग लाइनें विकसित करने की तैयारी है। प्रत्येक लाइन करीब 600 मीटर लंबी बताई गई है। बरारी वाले मार्ग में बदलाव का संबंध भागलपुर रेलवे स्टेशन तक गंगा जल पहुंचाने के लिए प्रस्तावित पाइपलाइन से भी बताया गया है। यानी जिस बरारी क्षेत्र को कभी रेलवे ने गंगा पार परिवहन के लिए इस्तेमाल किया था, वहां आज भी रेलवे और परिवहन से जुड़ी योजनाएं किसी न किसी रूप में बनी हुई हैं।

बरारी की कहानी केवल एक बंद रेलवे स्टेशन की कहानी नहीं है।

एक समय यहां से-भागलपुर → बरारी → स्टीमर → महादेवपुर → बिहपुर → उत्तर बिहार

का परिवहन नेटवर्क चलता था। आज जरूरत है कि उसी ऐतिहासिक भौगोलिक गलियारे को आधुनिक तकनीक और वर्तमान यातायात जरूरतों के हिसाब से फिर से देखा जाए। विक्रमशिला सेतु के सामने यदि भविष्य में रेल और सड़क दोनों के लिए उपयुक्त गंगा पुल की योजना बनती है, तो भागलपुर और नवगछिया के बीच संपर्क मजबूत होने के साथ-साथ कोसी और सीमांचल की ओर एक नया परिवहन गलियारा विकसित करने की संभावना पर भी विचार किया जा सकता है।

अब जरूरत है सर्वे और व्यवहार्यता अध्ययन की

बरारी-नवगछिया रेल कनेक्टिविटी जैसी परियोजना के लिए केवल मांग पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए रेलवे को विस्तृत सर्वे, यात्री व माल यातायात का आकलन, गंगा पर पुल की तकनीकी व्यवहार्यता, भूमि उपलब्धता, पर्यावरणीय पहलुओं और लागत का अध्ययन करना होगा। इसके बाद ही यह तय हो सकेगा कि यह परियोजना आर्थिक और तकनीकी रूप से कितनी व्यवहार्य है। लेकिन, एक बात स्पष्ट है-भागलपुर, नवगछिया, कोसी और सीमांचल व कोसी के बीच बेहतर रेल संपर्क की जरूरत को अब क्षेत्रीय परिवहन योजना में गंभीरता से देखने का समय है।

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