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बिहार शिक्षक स्थानांतरण 2026: ऐच्छिक तबादला या मजबूरी? 30 स्कूलों के विकल्प और सरप्लस पर उठे सवाल

 

‎जागरण प्रभात।बिहार में शिक्षकों के स्थानांतरण की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठने लगे हैं। शिक्षकों का कहना है कि सरकार इसे ऐच्छिक स्थानांतरण बता रही है, लेकिन जिस तरह विकल्प और सरप्लस की प्रक्रिया लागू की गई है, उससे कई शिक्षक इसे अपनी पसंद का तबादला नहीं मान रहे हैं। दूसरी ओर शिक्षा विभाग की व्यवस्था का उद्देश्य विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता और आवश्यकता के बीच संतुलन स्थापित करना बताया गया है।

‎30 स्कूलों का विकल्प, फिर भी शिक्षकों की आपत्ति

‎नई व्यवस्था के तहत अधिशेष श्रेणी में आने वाले शिक्षकों को शिक्षक-अभाव वाले विद्यालयों के लिए अधिकतम 30 विकल्प देने हैं। स्थानांतरण अंक आधारित प्रणाली से किए जाने की बात कही गई है।इसी व्यवस्था को लेकर शिक्षकों का सवाल है कि यदि स्थानांतरण वास्तव में ऐच्छिक है तो शिक्षक को अपनी पसंद का विद्यालय चुनने की पूरी स्वतंत्रता क्यों नहीं दी जा रही है? उनका तर्क है कि केवल विभाग की ओर से उपलब्ध कराए गए विद्यालयों में से विकल्प चुनना पूरी तरह मनचाहा स्थानांतरण नहीं कहा जा सकता।

‎शिक्षकों का कहना है कि ऐच्छिक स्थानांतरण में शिक्षक अपनी पसंद के विद्यालय का चयन करता है। जबकि मौजूदा प्रक्रिया में पहले विद्यालयों को अधिशेष या शिक्षक-अभाव की श्रेणी में रखा जा रहा है और उसके बाद संबंधित शिक्षकों को उपलब्ध विकल्पों में आवेदन करना पड़ रहा है।आवेदन नहीं करने पर क्या होगा?

शिक्षकों ने उठाया बड़ा सवाल

शिक्षकों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि जो शिक्षक स्थानांतरण के लिए आवेदन नहीं करना चाहते, उनके साथ आगे क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी। शिक्षकों का कहना है कि यदि आवेदन नहीं करने की स्थिति में भी स्थानांतरण किया जाना है, तो इसे केवल ऐच्छिक स्थानांतरण कहना उचित नहीं होगा।

‎हालांकि, इस संबंध में किसी शिक्षक के व्यक्तिगत मामले में अंतिम स्थिति संबंधित विभागीय आदेश और लागू एसओपी से ही तय होगी। इसलिए शिक्षकों की इस आपत्ति पर शिक्षा विभाग से स्पष्ट दिशा-निर्देश की अपेक्षा की जा रही है।

‎जिस स्कूल में शिक्षक पूरे थे, वहां अतिरिक्त शिक्षक भेजे क्यों गए?

‎शिक्षकों की दूसरी बड़ी आपत्ति विद्यालयों में शिक्षक उपलब्धता को लेकर है। उनका सवाल है कि यदि किसी विद्यालय में पहले से ही पर्याप्त शिक्षक थे, तो वहां अतिरिक्त शिक्षकों की पोस्टिंग क्यों की गई? अब यदि उसी विद्यालय में शिक्षक संख्या आवश्यकता से अधिक हो गई है और कुछ शिक्षकों को अधिशेष घोषित किया जा रहा है, तो शिक्षकों का सवाल है कि अधिशेष की स्थिति पैदा होने से पहले विद्यालयवार शिक्षक आवश्यकता का आकलन क्यों नहीं किया गया?

‎नई प्रक्रिया में विद्यालयों की आवश्यकता का आकलन

‎ शैक्षणिक सत्र 2025-26 के नामांकन के आधार पर किए जाने तथा पहले अधिशेष और शिक्षक-अभाव वाले विद्यालयों की सूची जारी करने का प्रावधान बताया गया है।

‎पांच साल का नियम भी सवालों के घेरे में

‎शिक्षकों ने पांच वर्ष की सेवा के आधार पर अधिशेष निर्धारित किए जाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया है। उनका कहना है कि यदि किसी विद्यालय में पांच वर्ष या उससे अधिक समय से कार्यरत होना ही अधिशेष की कसौटी है, तो उस विद्यालय में पांच वर्ष पूरे कर चुके सभी शिक्षकों पर समान नियम लागू होना चाहिए।

‎शिक्षकों का सवाल है कि एक ही विद्यालय में समान अवधि से कार्यरत शिक्षकों में से कुछ को ही अधिशेष श्रेणी में रखा गया है तो उसका स्पष्ट आधार क्या है? क्या इसमें विषय, पद, वरीयता, अंक या किसी अन्य मानक का इस्तेमाल किया गया है? विभागीय प्रक्रिया में एक ही विद्यालय में पांच वर्ष या उससे अधिक समय से कार्यरत शिक्षकों को अधिशेष श्रेणी में रखने की बात सामने आई है, लेकिन वास्तविक सूची में किस शिक्षक को किस आधार पर अधिशेष माना गया है, यह संबंधित विद्यालय और विभागीय रिकॉर्ड से स्पष्ट होना जरूरी है।

‎शिक्षकों का कहना है कि पूरी प्रक्रिया को लेकर भ्रम दूर करने के लिए विभाग को विद्यालयवार शिक्षक आवश्यकता, स्वीकृत पद, कार्यरत शिक्षकों की संख्या और अधिशेष घोषित शिक्षकों की संख्या सार्वजनिक करनी चाहिए। यदि किसी विद्यालय में शिक्षक आवश्यकता से अधिक हैं तो उसका आधार भी स्पष्ट किया जाए। साथ ही यह बताया जाए कि एक ही विद्यालय में कार्यरत शिक्षकों में से किसे अधिशेष घोषित करने का निर्णय किस मानक के आधार पर लिया गया।

पारदर्शिता से दूर होगा विवाद

‎शिक्षा विभाग ने नई व्यवस्था को पारदर्शी और पोर्टल आधारित बताया है। प्रक्रिया का उद्देश्य शिक्षकों की उपलब्धता और विद्यालयों की आवश्यकता के बीच संतुलन स्थापित करना है।ऐसे में शिक्षकों की आपत्तियों का समाधान भी आंकड़ों और स्पष्ट नियमों के आधार पर किया जा सकता है। यदि विद्यालयवार पद, नामांकन, शिक्षक संख्या और सरप्लस निर्धारण का आधार सार्वजनिक कर दिया जाए तो शिक्षकों के बीच पैदा हुए कई सवालों का जवाब स्वतः मिल सकता है।

‎मुख्य सवाल यही है—क्या यह वास्तव में ऐच्छिक 

स्थानांतरण है या ऐसी प्रक्रिया जिसमें शिक्षक को उपलब्ध विकल्पों में से ही विद्यालय चुनने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है? इसका स्पष्ट जवाब शिक्षा विभाग की ओर से सामने आना बाकी है।

‎नोट: इस खबर में शिक्षकों की ओर से उठाई गई आपत्तियों को उनके सवाल और मांग के रूप में प्रस्तुत किया गया है। 

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