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BRICS: IMF-World Bank में सुधार की मांग तेज, उभरती अर्थव्यवस्थाओं को मिलेगा बड़ा प्रतिनिधित्व

 


जागरण प्रभात। ब्रिक्स के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक के गवर्नरों ने वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बड़े बदलाव की मांग को एक बार फिर तेज कर दिया है। समूह ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसे प्रमुख वैश्विक वित्तीय संस्थानों में उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की आवाज तथा प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर जोर दिया है। यह मांग ऐसे समय उठी है जब दुनिया व्यापारिक विखंडन, भू-राजनीतिक तनाव, संरक्षणवाद, बढ़ते कर्ज और आर्थिक अनिश्चितता जैसी कई चुनौतियों से गुजर रही है।

भारत की अध्यक्षता में हो रही ब्रिक्स गतिविधियों के बीच वित्तीय सहयोग का एजेंडा अब पारंपरिक आर्थिक नीतियों से आगे बढ़कर सीमा-पार भुगतान, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, डिजिटल वित्त, वित्तीय सुरक्षा, बीमा, पेंशन और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों तक पहुंच गया है।

IMF और World Bank में बदलाव की मांग

ब्रिक्स वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों ने संयुक्त बयान में कहा कि ब्रेटन वुड्स संस्थानों में सुधार की तत्काल आवश्यकता है। ब्रेटन वुड्स संस्थानों से मुख्य रूप से IMF और World Bank का संदर्भ है। ब्रिक्स का तर्क है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में उभरते बाजारों और विकासशील देशों की हिस्सेदारी जिस तेजी से बढ़ी है, उसी अनुपात में इन संस्थानों की निर्णय प्रक्रिया में उनका प्रतिनिधित्व नहीं बढ़ा है। समूह ने IMF और World Bank को अधिक प्रतिनिधित्व वाला, पारदर्शी, जवाबदेह, प्रभावी और समावेशी बनाने की मांग की है। ब्रिक्स के अनुसार वैश्विक आर्थिक शासन में बदलाव ऐसा होना चाहिए, जिसमें आज की आर्थिक वास्तविकताओं को बेहतर तरीके से जगह मिले। यह मांग नई नहीं है, लेकिन विस्तारित ब्रिक्स के बढ़ते आर्थिक और जनसांख्यिकीय प्रभाव के कारण इसका महत्व पहले से ज्यादा बढ़ गया है।

IMF कोटा में पुनर्संतुलन पर जोर

ब्रिक्स ने IMF की कोटा व्यवस्था को लेकर भी अपना रुख स्पष्ट किया है। समूह ने 16वीं सामान्य कोटा समीक्षा के तहत सहमत वृद्धि को लागू करने का समर्थन किया है और 17वीं समीक्षा के दौरान सार्थक पुनर्संरेखण की मांग की है। ब्रिक्स चाहता है कि IMF में उभरती तथा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की कोटा और मतदान हिस्सेदारी बढ़े। साथ ही सबसे गरीब देशों के हितों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाए। कोटा IMF की निर्णय प्रक्रिया में किसी देश की वित्तीय हिस्सेदारी और उसके मतदान अधिकार से जुड़ा महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए कोटा में बदलाव का सीधा असर संस्था में देशों के प्रभाव पर पड़ता है।

World Bank में भी बढ़े विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व

ब्रिक्स ने World Bank की शेयरधारिता समीक्षा को भी विकासशील देशों की आवाज मजबूत करने का महत्वपूर्ण अवसर बताया है। समूह का कहना है कि विकासशील देशों को वैश्विक विकास वित्त से जुड़े फैसलों में अधिक प्रभाव मिलना चाहिए। इसके लिए शेयरधारिता में ऐसा बदलाव जरूरी है जो विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के ऐतिहासिक रूप से कम प्रतिनिधित्व को दूर कर सके। यानी ब्रिक्स की मांग केवल IMF तक सीमित नहीं है। समूह चाहता है कि वैश्विक विकास वित्त की पूरी संरचना में Global South की भूमिका बढ़े।

व्यापार युद्ध और संरक्षणवाद पर चिंता

ब्रिक्स वित्त प्रमुखों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद जोखिमों को लेकर भी चिंता जाहिर की है। इनमें भू-राजनीतिक तनाव, व्यापार का विखंडन, संरक्षणवाद, नीतिगत अनिश्चितता, राजकोषीय दबाव, महंगाई, बढ़ता कर्ज और वित्तीय कमजोरियां शामिल हैं। समूह ने एकतरफा शुल्क और गैर-शुल्क उपायों पर गंभीर चिंता जताई है। उसका कहना है कि इस तरह के कदम अंतरराष्ट्रीय व्यापार को विकृत कर सकते हैं और विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के अनुरूप नहीं हैं। यह मुद्दा ऐसे समय महत्वपूर्ण है जब दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच शुल्क और व्यापार नीतियों को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है। BRICS वित्त प्रमुखों का संदेश साफ है कि व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को ऐसी दिशा नहीं मिलनी चाहिए जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़े।

सीमा-पार भुगतान को आसान बनाने की कोशिश

ब्रिक्स का आर्थिक एजेंडा अब केवल IMF और World Bank सुधार तक सीमित नहीं है। समूह सीमा-पार भुगतान को अधिक तेज, सुरक्षित और कम लागत वाला बनाने पर भी काम कर रहा है। हालिया चर्चाओं में ब्रिक्स देशों के भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर संपर्क और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की बात सामने आई है। भारत की UPI जैसी डिजिटल भुगतान व्यवस्था को भी इस संदर्भ में उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। भारत की ओर से ब्रिक्स देशों के भुगतान तंत्र को जोड़ने और सदस्य देशों की स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य डॉलर को तत्काल खत्म करना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए अतिरिक्त और अधिक व्यावहारिक विकल्प तैयार करना है।

डिजिटल करेंसी भी एजेंडे में

ब्रिक्स के वित्तीय सहयोग में केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी यानी CBDC भी महत्वपूर्ण विषय बनती जा रही है। भारत ने ब्रिक्स देशों की डिजिटल मुद्राओं के बीच संभावित संपर्क और सीमा-पार भुगतान को आसान बनाने की दिशा में चर्चा आगे बढ़ाई है। हालांकि तकनीकी, नियामकीय और राजनीतिक चुनौतियां अभी मौजूद हैं। इसका मतलब यह है कि आने वाले वर्षों में ब्रिक्स का वित्तीय सहयोग केवल पारंपरिक बैंकिंग तक सीमित नहीं रहने वाला है। डिजिटल भुगतान और नई वित्तीय तकनीकें भी इसका अहम हिस्सा बन सकती हैं।

New Development Bank की भूमिका बढ़ाने पर जोर

ब्रिक्स ने New Development Bank (NDB) की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना है। यह बैंक मूल ब्रिक्स देशों द्वारा स्थापित बहुपक्षीय विकास बैंक है और बुनियादी ढांचे तथा सतत विकास परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराने पर केंद्रित है। ब्रिक्स के लिए NDB इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे विकासशील देशों को पारंपरिक पश्चिमी वित्तीय संस्थानों के अलावा एक अतिरिक्त बहुपक्षीय वित्तपोषण मंच मिलता है। समूह चाहता है कि Global South में विकास और बुनियादी ढांचे की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस तरह की संस्थाओं की क्षमता और प्रभाव बढ़े।

आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था भी महत्वपूर्ण

ब्रिक्स की Contingent Reserve Arrangement (CRA) भी वित्तीय सहयोग का अहम हिस्सा है। यह ऐसा वित्तीय सुरक्षा तंत्र है जिसे भुगतान संतुलन संबंधी दबाव का सामना करने वाले सदस्य देशों के लिए सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। वित्तीय सहयोग को अधिक प्रभावी बनाने के लिए CRA से जुड़े नियमों और प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने पर भी काम चल रहा है। ब्रिक्स की पिछली वित्तीय चर्चाओं में भी इस व्यवस्था को अधिक लचीला और प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया था।

बीमा और 'BRICS Risk Lab' की योजना

वित्तीय सहयोग के नए क्षेत्रों में बीमा भी तेजी से महत्वपूर्ण हो रहा है। ब्रिक्स देशों ने अधिक आत्मनिर्भर बीमा परिवेश विकसित करने पर चर्चा की है। भारत की ओर से गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी यानी GIFT City में स्वैच्छिक 'BRICS Risk Lab' स्थापित करने का प्रस्ताव भी चर्चा में है। इसका उद्देश्य साझा जोखिम मॉडल विकसित करना और पुनर्बीमा क्षमताओं को मजबूत करना है। यदि यह पहल आगे बढ़ती है तो इससे ब्रिक्स देशों के बीच वित्तीय जोखिमों को समझने, उनका आकलन करने और उनसे निपटने के लिए साझा ढांचा तैयार करने में मदद मिल सकती है।

11 देशों के साथ बढ़ा BRICS का दायरा

विस्तारित ब्रिक्स अब पहले की तुलना में कहीं बड़ा समूह है। इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया और सऊदी अरब शामिल हैं। इस विस्तार ने समूह को आर्थिक और भौगोलिक दृष्टि से अधिक विविध बनाया है। हालिया रिपोर्टों में भी इसे करीब आधी वैश्विक आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाले समूह के रूप में रेखांकित किया गया है। हालांकि सदस्य देशों के आर्थिक हित और विदेश नीति प्राथमिकताएं हमेशा एक जैसी नहीं हैं। यही कारण है कि BRICS के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल विस्तार नहीं, बल्कि अलग-अलग देशों के बीच व्यावहारिक आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाना भी है।

BRICS के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती क्या?

BRICS के सामने असली परीक्षा यह होगी कि संयुक्त बयानों में कही गई बातों को कितनी तेजी से व्यावहारिक व्यवस्था में बदला जाता है। IMF और World Bank में सुधार की मांग लंबे समय से चल रही है। इसी तरह स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान और डिजिटल करेंसी को लेकर भी चर्चाएं पहले से होती रही हैं। अब भारत की अध्यक्षता में BRICS जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, उसमें इन मुद्दों को ज्यादा व्यावहारिक रूप देने की कोशिश दिखाई दे रही है। भुगतान प्रणालियों की इंटरऑपरेबिलिटी, विकास वित्त, बुनियादी ढांचा, बीमा और वित्तीय सुरक्षा जैसे क्षेत्र इसके उदाहरण हैं।

निष्कर्ष: Global South की बदलती आर्थिक ताकत

BRICS की मौजूदा वित्तीय पहल को केवल IMF या World Bank में हिस्सेदारी बढ़ाने की मांग के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे वैश्विक आर्थिक शक्ति के बदलते संतुलन की बड़ी तस्वीर भी दिखाई देती है। उभरती अर्थव्यवस्थाएं चाहती हैं कि वैश्विक आर्थिक संस्थानों में उनकी बढ़ती भूमिका निर्णय प्रक्रिया में भी दिखाई दे। दूसरी ओर, BRICS अपने भीतर भुगतान, निवेश, विकास वित्त और वित्तीय सुरक्षा के नए रास्ते तैयार करने की कोशिश कर रहा है। भारत की अध्यक्षता में इस एजेंडे का व्यावहारिक पक्ष खास तौर पर महत्वपूर्ण है। यदि सदस्य देश भुगतान तंत्र, स्थानीय मुद्रा व्यापार, विकास वित्त और वित्तीय सुरक्षा के क्षेत्र में ठोस प्रगति कर पाते हैं, तो BRICS की भूमिका केवल एक राजनीतिक समूह तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में एक प्रभावशाली वित्तीय मंच के रूप में और मजबूत हो सकती है।

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