जागरण प्रभात। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग सात साल बाद भारत पहुंचे हैं। 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए शनिवार को नई दिल्ली पहुंचे शी चिनफिंग की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ आज महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक प्रस्तावित है। यह मुलाकात ऐसे समय हो रही है जब 2020 के गलवान संघर्ष के बाद लंबे समय तक तनावपूर्ण रहे भारत-चीन संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने की कोशिश चल रही है।शी चिनफिंग के भारत पहुंचने पर केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद ने दिल्ली हवाई अड्डे पर उनका स्वागत किया। पारंपरिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ चीनी राष्ट्रपति का स्वागत किया गया। उनके साथ चीन का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी भारत आया है, जिसमें वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और प्रमुख कारोबारी शामिल हैं।
शी और मोदी से अहम बातचीत होगी
शी चिनफिंग की यह भारत यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह करीब सात साल बाद उनका भारत दौरा है। उनकी पिछली भारत यात्रा अक्टूबर 2019 में हुई थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी चिनफिंग ने चेन्नई के निकट महाबलीपुरम में अनौपचारिक शिखर वार्ता की थी। इसके कुछ ही महीनों बाद पूर्वी लद्दाख में सैन्य तनाव शुरू हुआ और 2020 के गलवान संघर्ष ने दोनों देशों के संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित किया। अब दोनों देशों के बीच कई स्तरों पर बातचीत दोबारा तेज हुई है। इसी क्रम में प्रधानमंत्री मोदी और शी चिनफिंग की मुलाकात को भारत-चीन संबंधों में आगे की दिशा तय करने वाली अहम बैठक के रूप में देखा जा रहा है।
LAC पर स्थिति और सीमा विवाद रहेगा अहम मुद्दा
मोदी और शी की बातचीत में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) की स्थिति प्रमुख मुद्दों में शामिल हो सकती है। दोनों देशों के बीच पूर्वी लद्दाख में सैन्य तनाव कम करने की दिशा में पिछले कुछ समय में कदम उठाए गए हैं, लेकिन सीमा से जुड़े कई सवाल अभी भी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं। हाल में भारत और चीन के सैन्य अधिकारियों के बीच अरुणाचल प्रदेश क्षेत्र में भी उच्चस्तरीय सैन्य बातचीत हुई है। ऐसे में मोदी-शी बैठक में सीमा पर शांति एवं स्थिरता बनाए रखने और दोनों देशों के बीच सैन्य तथा कूटनीतिक संवाद को आगे बढ़ाने पर चर्चा की उम्मीद है। भारत लगातार यह रुख रखता रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता ही द्विपक्षीय संबंधों में व्यापक सुधार का आधार बन सकती है।
व्यापार और निवेश पर भी नजर
मोदी-शी बैठक का दूसरा बड़ा पक्ष व्यापार और निवेश हो सकता है। दोनों देशों के बीच व्यापार का आकार बड़ा है, लेकिन भारत लंबे समय से व्यापार असंतुलन और बाजार पहुंच से जुड़ी चिंताएं उठाता रहा है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक दोनों पक्ष आर्थिक संबंधों को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने, बाजार पहुंच, निवेश और व्यापारिक बाधाओं जैसे मुद्दों पर बातचीत की संभावनाएं तलाश रहे हैं। रणनीतिक आर्थिक संवाद की दिशा में भी चर्चा होने की खबरें सामने आई हैं। यानी बैठक सिर्फ सीमा विवाद तक सीमित नहीं रह सकती। भारत और चीन के बीच कारोबार, निवेश, यात्रा, संपर्क और आर्थिक सहयोग का भविष्य भी बातचीत के महत्वपूर्ण हिस्सों में शामिल हो सकता है।
डोभाल-वांग यी वार्ता ने तैयार किया माहौल
शी चिनफिंग की भारत यात्रा से पहले दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय कूटनीतिक संपर्क भी बढ़ा है। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ता हुई थी। विशेष प्रतिनिधि तंत्र का गठन भारत-चीन सीमा विवाद के व्यापक समाधान की तलाश के लिए 2003 में किया गया था। हाल की वार्ताओं में सीमा प्रबंधन, शांति बनाए रखने और सीमा से जुड़े संवाद को जारी रखने जैसे विषयों पर जोर रहा है। इससे संकेत मिलता है कि दोनों देश अब मतभेदों को बातचीत के जरिए नियंत्रित करने और संबंधों में स्थिरता लाने की कोशिश कर रहे हैं।
गलवान के बाद रिश्तों में आया था बड़ा बदलाव
2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत और चीन के संबंधों में भारी गिरावट आई थी। सैन्य तनाव के साथ राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर भी दोनों देशों के बीच अविश्वास बढ़ा। इसके बाद कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक वार्ताएं हुईं। सीमा पर तनाव कम करने के लिए सैनिकों की वापसी और संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। अब दोनों देश संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। हालांकि, विशेषज्ञों और अधिकारियों के स्तर पर यह भी माना जा रहा है कि संबंधों में सुधार की प्रक्रिया अभी शुरुआती और सावधानी भरी अवस्था में है। सीमा विवाद, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और व्यापार असंतुलन जैसे मुद्दे अभी भी चुनौती बने हुए हैं।
सीधे संपर्क और आवाजाही भी हो रही सामान्य
भारत-चीन संबंधों में धीरे-धीरे सुधार का असर लोगों की आवाजाही और संपर्क पर भी दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों को दोबारा बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। चीन की एक प्रमुख एयरलाइन ने दिल्ली-ग्वांगझोउ मार्ग पर नियमित उड़ानें फिर शुरू करने की घोषणा भी की है। यह कदम दोनों देशों के बीच कारोबारी और लोगों के स्तर पर संपर्क बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
BRICS के मंच पर भी अहम भूमिका
शी चिनफिंग की भारत यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से ही महत्वपूर्ण नहीं है। वह 18वें BRICS Summit में भी हिस्सा ले रहे हैं। नई दिल्ली में हो रहे सम्मेलन में व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक शासन, तकनीक और विकासशील देशों की भूमिका जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में हैं। ऐसे समय में भारत में शी चिनफिंग की मौजूदगी BRICS के भीतर भारत-चीन संवाद को भी महत्वपूर्ण बनाती है। भारत BRICS मंच पर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करते हुए अमेरिका, रूस, चीन और अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
क्या बदलेगा भारत-चीन संबंधों का समीकरण?
मोदी और शी की बैठक से तत्काल किसी बड़े समझौते की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी। लेकिन इस मुलाकात का महत्व इस बात में है कि दोनों नेता सीधे तौर पर उन मुद्दों पर चर्चा करेंगे जिन्होंने पिछले वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित किया है। सीमा पर स्थिरता, व्यापार में संतुलन, निवेश, संपर्क और आपसी विश्वास बहाली ये सभी ऐसे क्षेत्र हैं जहां धीरे-धीरे प्रगति की जरूरत है। चीन ने भी बैठक से पहले भारत के साथ सकारात्मक संबंध विकसित करने का संकेत दिया है। बीजिंग की ओर से दोनों देशों को अच्छे पड़ोसी और एक-दूसरे की सफलता में सहयोगी साझेदार बनाने पर जोर दिया गया है।
आज की बैठक पर दुनिया की नजर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी चिनफिंग की आज की बैठक इसलिए भी अहम है क्योंकि यह दोनों देशों के बीच संवाद को एक नए चरण में ले जाने का अवसर दे सकती है। बैठक में सीमा की स्थिति, व्यापार एवं निवेश और द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने के उपायों पर चर्चा होने की उम्मीद है। हालांकि, भारत के लिए सीमा पर शांति और सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देश बातचीत को जमीन पर कितनी प्रगति में बदल पाते हैं।
जागरण प्रभात की नजर में: शी चिनफिंग का सात साल बाद भारत आना केवल एक राजनयिक यात्रा नहीं, बल्कि 2020 के बाद बदले भारत-चीन रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। असली परीक्षा अब इस बात की होगी कि दिल्ली में होने वाली बातचीत से भरोसा कितना बढ़ता है और सीमा और व्यापार से जुड़े जटिल मुद्दों पर कितनी ठोस प्रगति होती है।

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